ट्विन टावर को रविवार को गिरा दिया गया । नोएडा के सेक्‍टर 93-A में स्‍थ‍ित सैकड़ों करोड़ रुपये की लागत से कई सालों में बनकर तैयार हुई ये गगनचुंबी इमारत महज़ नौ सेकेंड में जमीन में मिल गई । ट्विन टॉवर्स को बनाने वाली कंपनी सुपरटेक ब‍िल्‍डर्स के माल‍िक आरके अरोड़ा  ने टॉवर ग‍िरने के बाद अपना दर्द बयां क‍िया है । आरके अरोड़ा ने कहा ट्विन टॉवर को गिराए जाने से कंपनी को करीब 500 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है ।

ट्विन टावर सुपरटेक कंपनी ने बनाया था । सुपरटेक कंपनी के मालिक का नाम आरके अरोड़ा है । आरके अरोड़ा ने 34 कंपनियां खड़ी की है । ये कंपनियां सिविल एविएशन, कंसलटेंसी, ब्रोकिंग, प्रिंटिंग, फिल्म्स, हाउसिंग फाइनेंस, कंस्ट्रक्शन तक के काम करती है । यही नहीं, मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो आरके अरोड़ा ने तो कब्रगाह बनाने तक की कंपनी भी खोली है ।

आरके अरोड़ा ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर सात दिसंबर 1995 को इस कंपनी की शुरुआत की थी । कंपनी ने नोएडा, ग्रेटर नोएडा, यमुना विकास प्राधिकरण क्षेत्र, मेरठ, दिल्ली-एनसीआर समेत देशभर के करीब 12 शहरों में रियल स्टेट के प्रोजेक्ट लॉन्च किए ।

ट्विन टावर का मामला सुप्रीम कोर्ट में क्यों पहुंचा ?

नोएडा स्थित ट्विंस टावर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुपरटेक सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया । सुप्रीम कोर्ट में सात साल चली लड़ाई के बाद 31 अगस्त 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को बरकार रखा । सुप्रीम कोर्ट ने तीन महीने के अंदर ट्विन टावर को गिराने का आदेश दिया ।सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सेक्टर-93ए स्थित सुपरटेक एमराल्ड कोर्ट के ट्विन टावर रविवार दोपहर 2:30 बजे जमींदोज हो गई । 32 मंजिला एपेक्स (100 मीटर) व 29 मंजिला सियान (97 मीटर) टावर में 3500 किलोग्राम विस्फोटक लगाकर तारों से जोड़ दिया गया  । महज 9 से 12 सेकेंड में ये इमारतें जमींदोज हो गई ।

ट्विन टावर

ट्विन टावर मामले में कौन से नियमों को अनदेखा किया गया ?

सुपरटेक को 13.5 एकड़ जमीन आवंटित की गई थी । परियोजना का 90 फीसदी यानी करीब 12 एकड़ हिस्से पर 2009 में ही निर्माण पूरा कर लिया गया था । 10 फीसदी हिस्से को ग्रीन जोन दिखाया गया । साल 2011 आते-आते दो नए टावरों के बनने की खबरें आने लगी । 12 एकड़ में जितना निर्माण किया गया, उतना एफएआर का खेल खेलकर दो गगनचुंबी इमारतों के जरिये 1.6 एकड़ में ही करने का काम तेजी से जारी था । अंदाजा लगाया जा सकता है कि 12 एकड़ में 900 परिवार रह रहे हैं, इतने ही परिवार 1.6 एकड़ में बसाने की तैयारी थी । ‌

फ्लैट बायर्स ने 2009 में आरडब्ल्यू बनाया। इसी आरडब्ल्यू ने सुपरटेक के खिलाफ कानूनी लड़ाई की शुरुआत की। ट्विन टावर के अवैध निर्माण को लेकर आरडब्ल्यू ने पहले नोएडा अथॉरिटी मे गुहार लगाई। अथॉरिटी में कोई सुनवाई नहीं होने पर आरडब्ल्यू इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा। 2014 में हाईकोर्ट ने ट्विन टावर तोड़ने का आदेश जारी किया। इस लड़ाई में यूबीएस तेवतिया, एसके शर्मा, रवि बजाज, वशिष्ठ शर्मा, गौरव देवनाथ, आरपी टंडन, अजय गोयल ने अग्रणी भूमिका निभाई ।

ट्विन टावर गिरने से पहले सुपरटेक बयान आया था सामने

ट्विन टावर गिराए जाने से कुछ समय पहले सुपरटेक का बयान आया है । बयान में कहा गया है कि प्राधिकरण को पूरा भुगतान करने के बाद हमने टावर का निर्माण किया था । हालांकि, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने तकनीकी आधार पर निर्माण को संतोषजनक नहीं पाया है और दोनों टावरों को ध्वस्त करने के आदेश जारी किए ।

हम सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का सम्मान करते है और उसे लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है । हमने एक विश्व प्रसिद्ध कंपनी एडिफिस इंजीनियरिंग को ध्वस्त का काम सौंपा है, जिनके पास ऊंची इमारतों को सुरक्षित रूप से गिराने में विशेषज्ञता है । हमने करीब 70000 से अधिक लोगों फ्लैट्स तैयार करके दे दिए है । बाकी लोगों को भी निर्धारित समय में फ्लैट देने के लिए प्रतिबद्ध है ।

 

ट्विन टावर के मालिक ने कही ये बात

ट्विन टावर के मालिक  ने बताया क‍ि इमारत को ढहाए जाने से उसके निर्माण पर आई लागत व कर्ज पर देय ब्याज के रूप में कंपनी को 500 करोड़ रुपये के नुकसान का हुआ है । सुप्रीम कोर्ट ने मानकों का उल्लंघन कर इस 100 मीटर ऊंची आवासीय इमारत के निर्माण को गैरकानूनी बताते हुए इसे गिराए जाने का आदेश दिया था ।   सुपरटेक चेयरमैन ने कहा क‍ि इमारत को बनाते समय सभी प्रकार के अप्रूवल ल‍िए गए थे । हमने खुद इस ब‍िल्‍ड‍िंग को बनाया और ग‍िराने का खर्च भी खुद ही दिया ।

ट्विन टावर मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए 28 अगस्त रविवार दोपहर 2.30 बजे ट्विन टॉवर को व‍िस्‍फोटक लगाकर कुछ सेकेंड में ग‍िरा द‍िए गए । अरोड़ा ने कहा, हमें इन टावर में फ्लैट खरीदने वाले ग्राहकों को भी 12 प्रतिशत की दर से ब्याज देना पड़ा है. इन टावर में बने 900 से अधिक फ्लैट की मौजूदा बाजार मूल्य के हिसाब से कीमत करीब 700 करोड़ रुपये थी ।

ट्विन टावर क्यों था अवैध ?

सुपरटेक को 13.5 एकड़ जमीन आवंटित की गई थी । परियोजना का 90 फीसदी यानी करीब 12 एकड़ हिस्से पर 2009 में ही निर्माण पूरा कर लिया गया था । 10 फीसदी हिस्से को ग्रीन जोन दिखाया गया । साल 2011 आते-आते दो नए टावरों के बनने की खबरें आने लगी ।

ट्विन टावर गिराए जाने से कुछ समय पहले सुपरटेक का बयान आया है । बयान में कहा गया है कि प्राधिकरण को पूरा भुगतान करने के बाद हमने टावर का निर्माण किया था । हालांकि, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने तकनीकी आधार पर निर्माण को संतोषजनक नहीं पाया है और दोनों टावरों को ध्वस्त करने के आदेश जारी किए ।

12 एकड़ में जितना निर्माण किया गया, उतना एफएआर का खेल खेलकर दो गगनचुंबी इमारतों के जरिये 1.6 एकड़ में ही करने का काम तेजी से जारी था । अंदाजा लगाया जा सकता है कि 12 एकड़ में 900 परिवार रह रहे हैं, इतने ही परिवार 1.6 एकड़ में बसाने की तैयारी थी । ‌

फ्लैट बायर्स ने 2009 में आरडब्ल्यू बनाया था । इसी आरडब्ल्यू ने सुपरटेक के खिलाफ कानूनी लड़ाई की शुरुआत की । ट्विन टावर के अवैध निर्माण को लेकर आरडब्ल्यू ने पहले नोएडा अथॉरिटी मे गुहार लगाई । अथॉरिटी में कोई सुनवाई नहीं होने पर आरडब्ल्यू इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा था ।

साल 2014 में हाईकोर्ट ने ट्विन टावर तोड़ने का आदेश जारी किया । इस लड़ाई में यूबीएस तेवतिया, एसके शर्मा, रवि बजाज, वशिष्ठ शर्मा, गौरव देवनाथ, आरपी टंडन, अजय गोयल ने अग्रणी भूमिका निभाई ।

 

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