कभी ऑटो चलाया तो कभी मिमिक्री से कमाए 50 रुपये , जानिये राजू श्रीवास्तव के जीवन की कुछ अहम् किस्से। करियर की तरह इश्क़ मुक्कमल करने के लिए भी करना पड़ा लम्बा इंतज़ार , किसी फ़िल्मी लव स्टोरी से कम नहीं था राजू के प्यार का इज़हार। 42 दिन तक राजू ज़िन्दगी से जंग लड़ते रहे और अंततः गजोधर भैया अपनी जिंदगी के मंच से उतर गए।

राजू श्रीवास्तव , जितना बड़ा नाम उतना बड़ा संघर्ष , शायद इसीलिए मौत को भी राजू के साथ लम्बा संघर्ष करना पड़ा। 42 दिन तक राजू aiims में जिंदगी और मौत के बीच लड़ते रहे। अंत में प्रोग्राम के एनाउंसर की भांति डॉक्टर ने कहा की आज राजू ज़िन्दगी के मंच से उतर गया , लोग सामने बैठे रहे और कला पर्दा झूल गया। राजू की कहानी बहुत बड़ी है। मुंबई में ऑटो चलाने वाला सत्यप्रकाश आखिर राजू श्रीवास्तव कैसे बन गया।

साल 1982 में हीरो बनने का सपना लिए कानपूर का सत्यप्रकाश मुंबई पहुंचा और ज़िन्दगी का इम्तिहान यहाँ से शुरू हुआ। पहला काम ऑटो ड्राइवर का मिला। सत्यप्रकाश अपने चुटकुलों से सवारियों को हंसाते और मंजिल पर पहुंचाते थे , टिप में उन्हें 50 रूपए मिल जाते थे। सवारी ने स्टैंड अप कॉमेडी करने का सुझाव दिया और एनाउंसर ने उन्हें राजू का नाम दिया लोगों को यह नाम याद रह गया और इस तरह एक ही पल में कानपुर के किदवई नगर के निवासी रमेशचंद्र श्रीवास्तव का बेटा सत्यप्रकाश, राजू श्रीवास्तव बन गया.

पहली फिल्म मिलना अभी बाकी था , इंतज़ार 1988 में ख़तम हुआ था। फिल्म थी तेज़ाब। अपने इतने बड़े करियर में राजू ने 17 फिल्मों में अपने अभिनय का जादू दिखाया। लेकिन राजू का समय बड़े परदे से नहीं एक नए आविष्कार से शुरू होना था , 90 के दौर में टीवी आया और उसने राजू को घर घर पहुँचाया। लाफ्टर चैलेंज ने राजू को शोहरत के आसमान तक पहुँचाया। लेकिन राजू का करियर ‘लाफ्टर चैलेंज’ के भी लगभग 15 साल पहले शुरू हो चुका था. दरअसल, ‘लाफ्टर चैलेंज’ शो में राजू सबसे अनुभवी कलाकार थे, जो उस वक़्त तक कई लाइव कॉमेडी शोज़ पहले ही कर चुके थे. मगर न उन्हें अच्छा मेहनताना मिलता था, न वो ग्लैमर उनके पास था जो उन्हें टीवी ने दिया.

राजू को करियर की तरह प्यार पाने के लिए भी करना पड़ा था इंतज़ार , शिखा को देखते ही राजू को पहली नजर में हो गया था प्यार। राजू ने फतेहपुर में अपने भाई की शादी के दौरान शिखा को पहली बार देखा था और शिखा को देखते ही अपना गजोधर दिल हार बैठा था । तभी राजू ने शिखा को अपना बनाने की कसम खाई थी , शादी करूँगा तो शिखा से ही करूँगा हसरत दिल में पाली थी । शिखा उनकी भाभी की चाचा की बेटी थी , भाइयों ने प्यार पाने में उनकी खूब मदद की थी। राजू अपने भाई के ससुराल इटावा जाया करते थे , हिम्मत जुटा कर शिखा से बात किया करते थे। मुंबई पहुँच के शिखा को राजू ने खूब खत लिखा था और अंततः 17 मई, 1993 को राजू ने अपना प्यार हासिल किया था।

आज सत्यप्रकाश श्रीवास्तव मरा है , राजू नहीं क्युकी राजू कभी मरा नहीं करते , वो तो अपने किरदारों की भांति हमेशा अमर रहते है। स्टैंड अप आर्टिस्ट की एक नई पीढ़ी आज कॉमेडी में अश्लीलता का फूहड़पन डाल कर लोगो का दिल जीत ती है। लेकिन राजू की कॉमेडी अपनी देसीपन से लोगों का दिल जीतती थी। उनके किरदर हमारे आसपास के लोग ही होते थे , इसीलिए राजू अपने से लगते थे। उनकी कॉमेडी हँसा हँसा कर रुलाती थी , आज उनकी कहानी का अंत रुला गया

कहानी खत्म हुई और ऐसी खत्म हुई
कि लोग रोने लगे तालियां बजाते हुए..!

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