ज्ञानवापी का मामला इस समय आस्था के साथ-साथ राजनीति के भी केंद्र में है। एक बार फिर इतिहास के पन्ने खंगाले जा रहे हैं, मुगलों को फिर से बेनकाब किया जा रहा है। अदालत में सुनवाई भी चल रही है, फैसला अभी तक नहीं आया है। दरअसल सबसे पहले ज्ञानवापी मामले की सुनवाई बनारस के जिला अदालत में हो रही थी। लेकिन जिला अदालत में हो रही कार्यवाही को चुनौती देते हुए मुस्लिम पक्ष के लोगों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के बाद मामले को वाराणसी कोर्ट को ट्रांसफर किया कर दिया और साथ ही जिला अदालत को 8 सप्ताह में सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार आज जिला अदालत में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान ही हिंदू पक्ष के वकील हरिशंकर पांडेय ने ACJAM पंचम उज्ज्वल उपाध्याय की अदालत में अखिलेश यादव, असदुद्दीन ओवैसी, अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी के सचिव समेत आठ के खिलाफ अदालत में अर्जी दी। धार्मिक विद्वेष फैलाने, मानसिक व धार्मिक उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए सभी के खिलाफ कार्रवाई की अदालत से अपील की गई है।

 

जिला अदालत में सुनवाई के दौरान क्या-क्या हुआ?

 

आज सुनवाई वाराणसी जिला जज के अदालत में हुई। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यहां सुनवाई हुई जिसमें मामले को सुरक्षित रख लिया गया माना जा रहा है कि कल मंगलवार 24 मई को 2:00 बजे ज्ञानवापी परिसर में जुड़े विवाद का फैसला आ सकता है। जिला जज डॉक्टर अजय कृष्ण विश्वेश की अदालत दोनों पक्षों के वकीलों को सुनने के बाद यह फैसला सुरक्षित रखा है। कल यानी मंगलवार को यह साफ हो जाएगा कि यह मामला आगे की सुनवाई के लिए योग्य है या नहीं। आज लगभग 1 घंटे के करीब तक सुनवाई चली, जिसमें अदालत ने हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों को ध्यान से सुना। हिंदू पक्ष के लोगों के मुख्य मांग है कि शृंगार गौरी की पूजा करने का अधिकार मिले, साथ ही वजू खाने में मिले शिवलिंग की पूजा करने की भी मांग की गई। हिंदू पक्ष ने मांग की कि नदी के उत्तर में स्थित दीवार को तोड़कर मलवा हटाया जाए, शिव लिंग की लंबाई और चौड़ाई जानने के लिए सर्वे भी कराया जाए, हिंदू पक्ष के लोगों की यह भी मांग है कि वजू खाने का वैकल्पिक इंतजाम कराया जाए। वही मुस्लिम पक्ष ने वजू खाना सील किए जाने का विरोध किया, साथ ही उन्होंने 1991 कानून का हवाला देते हुए सर्वे और केस पर सवाल उठाया।

 

अखिलेश और ओवैसी पर धार्मिक विद्वेष फैलाने का आरोप

 

कोर्ट में सुनवाई के दौरान आज हिंदू पक्ष के वकील हरि शंकर पांडे ने अखिलेश यादव और असदुद्दीन ओवैसी के साथ 8 लोगों के खिलाफ अर्जी दाखिल की, उन्होंने आरोप लगाया कि इन लोगों ने धार्मिक विद्वेष फैलाने की कोशिश की। दरअसल ज्ञानवापी मामले पर सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही थी उसी समय अखिलेश यादव का एक बड़ा बयान आया था उन्होंने कहा था कि हमारे हिंदू धर्म में कहीं भी पत्थर रख दो, एक लाल झंडा रख दो पीपल के पेड़ के नीचे और मंदिर बन गया। अयोध्या में अखिलेश यादव से जब पत्रकारों ने ज्ञानवापी मस्जिद मे शिवलिंग मिलने के दावे के बारे में प्रश्न पूछा तो अखिलेश यादव ने ज्ञानवापी और अयोध्या दोनों मामले को जोड़ दिया उन्होंने कहा एक समय ऐसा था कि रात के अंधेरे में मूर्तियां रख दी गई थी।बीजेपी कुछ भी कर सकती है।बीजेपी कुछ भी करा सकती है। अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि अगर सर्वे अदालत के दिशा निर्देश पर हो रहा है तो रिपोर्ट बाहर कैसे आ गई।उन्होने कहा यह कोर्ट का मामला है। सबसे बड़ी बात है कि जिसकी जिम्मेदारी थी सर्वे करने की, आखिरकार वह रिपोर्ट बाहर कैसे आ गई।हमारे हिंदू धर्म में कहीं भी पत्थर रख दो, एक लाल झंडा रख दो पीपल के पेड़ के नीचे और मंदिर बन गया।हम सर्वे नहीं कर रहे हैं ना ही हम सुप्रीम कोर्ट है।

 

वजू के लिए तलाब का खुला होना जरूरी: ओवैसी

 

ज्ञानवापी परिसर को लेकर आए दिन असदुद्दीन ओवैसी कोई न कोई बयान देते रहते हैं। प्लेसेस ऑफ़ वरशिप एक्ट 1991 की दुहाई देने वाले असदुद्दीन ओवैसी अब वजू खाने को लेकर भी बोल रहे हैं उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि स्थानीय डीएम याचिकाकर्ताओं के साथ सहयोग कर रहे हैं। ओवैसी ने कहा, अगर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि धार्मिक अनुष्ठान की अनुमति दें तो इसमें तालाब से वजू शामिल है।जब तक वज़ू नहीं किया जाएगा तब तक नमाज़ नहीं पढ़ी जा सकती है। फव्वारा संरक्षित किया जा सकता है लेकिन तालाब खुला होना चाहिए। ओवैसी ने आगे कहा कि भविष्य के विवादों को लगाम लगाने के लिए पूजा स्थल अधिनियम 1991 बनाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर पर सुनवाई के दौरान कहा था कि यह कानून संविधान के बुनियादी ढांचे का हिस्सा है। अदालत को अपनी बात पर चलना चाहिए।

 

 

क्या है 1991 का कानून? आज अदालत में मुस्लिम पक्षों ने फिर दिया इस पर जोर

 

हिंदू पक्षकारों द्वारा जैसे ही शिवलिंग मिलने का दावा किया गया 1991 का प्लेसेस आफ वरशिप एक्ट (उपासना स्थल कानून)की चर्चा चारों ओर हो रही है। अब चर्चा इस बात की हो रही है कि क्या ज्ञानवापी परिसर में मिले शिवलिंग पर यह कानून लागू होगा या नहीं? दरअसल साल 1991 में नरसिम्हा राव सरकार इस कानून को लेकर आई थी। इस कानून के तहत देश में धार्मिक स्थलों पर 15 अगस्त 1947 के दिन की यथास्थिति लागू है, आसान भाषा में कहें तो 15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता। अयोध्या मामले को इसका अपवाद माना गया है। राम मंदिर आंदोलन के बाद देशभर में मौजूद मस्जिद और मंदिर की लड़ाई तेज हो गई थी। मंदिर मस्जिद को लेकर अलग-अलग दावे होने लगे थे। किसी मंदिर मस्जिद विवाद को खत्म करने के लिए नरसिम्हा राव सरकार यह कानून लेकर आए थी। उस वक्त बीजेपी ने इस कानून का खूब विरोध किया था। अश्वनी उपाध्याय ने इस कानून को लेकर कोर्ट में एक याचिका भी लगाई है उनका मानना है कि यह कानून हिंदू, जैन, सिख और बौद्ध धर्म के लोगों को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित करता है। जिन धार्मिक और तीर्थ स्थलों को विदेशी आक्रमणकारियों ने तोड़ा, उसे वापस पाने के उनके कानूनी रास्ते को भी बंद करता है।

 

ज्ञानवापी परिसर पर यह कानून लागू होगा कि नहीं?

 

यह कानून और ज्ञानवापी मामले को लेकर लोगों की राय अलग-अलग हैं। कुछ संविधान जानकारों का मानना है कि अगर शिवलिंग और अन्य साक्ष्य जिनके मिलने का दावा हिंदू पक्षकारों द्वारा किया जा रहा है। वह कोर्ट में साबित हो जाता है कि ज्ञानवापी मस्जिद के स्थान पर मंदिर थी, तो 1991 का उपासना स्थल कानून कोई बाधा नहीं बनेगा। क्योंकि यह बात साफ हो जाएगा कि 15 अगस्त 1947 को मस्जिद वाले स्थान पर अगर शिवलिंग मौजूद है तो इसे मस्जिद की मान्यता नहीं मिलेगी। सार्वजनिक जगह नमाज पढ़ने से कोई भी स्थान धार्मिक स्थान में तब्दील नहीं होता है। नमाज पढ़ने के आधार पर मुस्लिम पक्ष अगर मस्जिद होने का दावा करते हैं तो यह ज्यादा देर तक कोर्ट में नहीं ठहर सकता।आज भी पब्लिक डोमेन में औरंगजेब द्वारा काशी विश्वनाथ मंदिर तोड़े जाने का दस्तावेज और साक्ष्य मौजूद है। आजादी से पहले 1936 में भी मोहम्मद नाम के एक व्यक्ति द्वारा वाराणसी जिला अदालत में यह याचिका दायर की गई थी कि ज्ञानवापी परिसर को मस्जिद की जमीन घोषित कर दी जाए, जिसके बाद 1937 में अदालत ने मोहम्मद के इस याचिका को खारिज कर दिया। लेकिन इस स्थान पर नमाज पढ़ने की इजाजत दे दी गई।

 

शिवलिंग मिला है तो हमें संतुलन बनाना होगा :SC

 

मुस्लिम पक्ष के लोगों ने वाराणसी जिला अदालत के इस फैसले को अस्वीकार किया और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस चंद्रचूड़ ने निर्देश दिया कि अगर शिवलिंग मिला है तो हमें संतुलन बनाना होगा हम डीएम को निर्देशित करेंगे कि उस स्थान की सुरक्षा करें लेकिन मुस्लिम को नमाज करने से ना रोका जाए। साथ ही कार्यवाही के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने वाराणसी के जिलाधिकारी को उस परिसर को सील करने का निर्देश दिया जहां शिवलिंग पाया गया है। वजू खाना में प्रवेश प्रतिबंधित है और इसका उपयोग नहीं किया जाएगा। केवल 20 लोगों को प्रार्थना के लिए अनुमति दी जाएगी।

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