उत्तर प्रदेश में इस समय राज्यसभा चुनाव की चर्चाएं तेज है। रोज नए नए चौकानेवाले नाम सामने आ रहे हैं। कल तक माना जा रहा था कि समाजवादी पार्टी की लिस्ट तो फाइनल हो गई है,और डिंपल यादव राज्यसभा जा रही है। इसी बीच एक चौकाने वाली खबर आ गई कि डिंपल यादव के जगह समाजवादी पार्टी के समर्थन से राज्यसभा जयंत चौधरी जा रहे हैं। दरअसल उत्तर प्रदेश में सीटों के लिहाज से समाजवादी पार्टी अपने समर्थन से किन्ही तीन व्यक्तियों को राज्यसभा भी सकती है। जिनमें से कपिल सिब्बल और जावेद अली खान 25 मई को ही अपना पर्चा दाखिल कर दिए थे। कपिल सिब्बल निर्दलीय पर्चा दाखिल किए हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी उनका समर्थन करके उनको राज्यसभा भेजेगी। माना जा रहा था कि तीसरा नाम अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव का होगा लेकिन ऐसा हुआ है। आज यह समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर डिंपल यादव का नाम अंतिम क्षणों में क्यों काट दिया गया? क्या जयंत यादव को राज्यसभा भेजना अखिलेश यादव की कोई मजबूरी है। जयंत यादव समाजवादी पार्टी के साइकिल निशाल नहीं बल्कि अपने पार्टी के चुनाव निशान हैंडपंप से पर्चा क्यों दाखिल कर रहे हैं? जयंत को राज्यसभा भेजने से ओमप्रकाश राजभर और स्वामी प्रसाद मौर्य कहीं नाराज तो नहीं होंगे? क्या डिंपल को आजमगढ़ से उप चुनाव लड़ाया जाएगा? क्या अखिलेश यादव परिवारवाद के आरोप से डर गए है? आइए इन्हीं प्रश्नों को तफ़सील से समझते हैं।

 

डिंपल को अखिलेश क्यों नहीं भेज रहे हैं राज्यसभा?

 

अखिलेश यादव राज्यसभा में अपने परिवार का प्रतिनिधित्व चाहते थे यही कारण है कि डिंपल यादव को राज्यसभा भेजने के लिए वह तैयार हो गए थे। लेकिन उसके बाद से ही जयंत चौधरी के नाराजगी की खबरें आने लगी थी, जयंत चौधरी ने कुछ भी कहने से मना कर दिया था। यहां तक कि जयंत चौधरी मीडिया से भी बात करने को तैयार नहीं थे। जिसके बाद अखिलेश यादव को यह फैसला लेना पड़ा। दूसरा कारण यह है कि डिंपल यादव के पास लोकसभा जाने का एक विकल्प बचा हुआ है। आजमगढ़ लोकसभा सीट अखिलेश यादव ने छोड़ दिया है। वहां उप चुनाव होने वाले हैं। माना जा रहा है कि 23 जून को रामपुर आजमगढ़ दोनों लोकसभा सीट पर उपचुनाव हो सकते हैं। ऐसे में आजमगढ़ से डिंपल यादव को लोकसभा भेजा जा सकता है।

 

आजमगढ़ लोकसभा सीट से डिंपल लड़ेंगी उपचुनाव?

 

आजमगढ़ में समाजवादी पार्टी संगठन दो खेमे में बटी हुई है पहला डी पी यादव मुलायम सिंह यादव के करीबी पूर्व में मंत्री रहे, और दूसरा बलराम यादव। ऐसे में अगर संगठन में किसी एक खेमे के लोगों को टिकट दिया जाता तो नाराजगी और बढ़ जाती। ऐसे ही दिक्कत 2019 के लोकसभा चुनाव के समय भी आई थी बाद में अखिलेश यादव यहां से चुनाव लड़ गये। और इसी लड़ाई झगड़े को रोकने के लिए डिंपल यादव को लोकसभा लड़ाया जाएगा आजमगढ़ से। आजमगढ़ जिला यादव और मुस्लिम बहुल जिला है यहां 10 विधानसभा की सीटें हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी 10 की 10 सीट हार गई थी।तो ऐसे में डिंपल यादव का जीतना संभव है।

 

अंतिम क्षणों में जयंत का नाम क्यों हुआ फाइनल?

 

विधानसभा चुनाव खत्म होने के बाद अखिलेश और जयंत के बीच संवाद कम हो गए थे। जयंत पश्चिम यूपी में जाट और मुस्लिम समीकरण के साथ चुनाव लड़ने की तैयारी किए थे। लेकिन महज उन्हें 8 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। कुल मिलाकर कहें तो जयंत जाट और मुस्लिम समीकरण बनाने में विफल रहे। लेकिन 2012 मुजफ्फरनगर के दंगे के बाद से जाट और मुस्लिम में दीवारें खींच गई थी। 2012 के बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में पहली बार जाट समुदाय के लोगों ने रालोद को इतनी भारी मात्रा में वोट दिया है। जयंत को राज्यसभा भेजे जाने से अखिलेश यादव के एक और फायदा होगा 2024 लोकसभा चुनाव के लिए संगठन और मजबूत हो जाएगा। अखिलेश यादव पश्चिमी यूपी में भी कमाल दिखा पाएंगे। वजह जयंत का राज्यसभा जाना। जयंत के राज्यसभा जाने से बागपत लोकसभा सीट खाली हो जाएगी वहां से अखिलेश किसी अपने व्यक्ति को टिकट देकर जयंत से समर्थन करवाएंगे ऐसे धीरे-धीरे समाजवादी पार्टी अपना विस्तार कर रही है।

 

मुस्लिम + जाट समीकरण बैठा रहे हैं अखिलेश

 

जयंत को राज्यसभा भेजने का एक और कारण है वह है जाट वोट बैंक दरअसल समाजवादी पार्टी के खाते में 3 राज्यसभा की सीटें आ रही हैं उनमें से एक मुस्लिम चेहरे को समाजवादी पार्टी भेज रही है, दूसरा चेहरा कपिल सिब्बल है और तीसरा चेहरा जयंत चौधरी यानी कुल मिलाकर मुस्लिम प्लस जाट समीकरण अखिलेश यादव फिट करना चाहते हैं। मुस्लिम प्लस जाट समीकरण साध लेते हैं अगर अखिलेश तो आने वाले लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव को भारी फायदा होगा। 2024 लोकसभा चुनाव में पक्ष में यूपी में जाट+ मुस्लिम समीकरण से अखिलेश यादव को बढ़िया फायदा हो सकता है।

 

ओपी राजभर और स्वामी प्रसाद मौर्य का क्या होगा?

 

ओमप्रकाश राजभर विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा को हराने के लिए खूब मेहनत किए थे। खुद जहुराबाद विधानसभा सीट से चुनाव लड़े थे और अपने बेटे को शिवपुर से मैदान में उतारे थे। राजभर को तो चुनाव जीत गए लेकिन उनके बेटे बुरी तरह हार गए। ओमप्रकाश राजभर के पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का बैनर देखेंगे उसमें दो जन की आपकी तस्वीर दिखेगी पहली ओमप्रकाश राजभर और दूसरी उनके बेटे अरविंद राजभर की और आज की राजनीति में पुत्रमोह किसे नहीं होता। जयंत चौधरी की पार्टी 8 सीटें जीती थी वही ओमप्रकाश राजभर की पार्टी भी 6 सीटें जीती थी। औसत के आधार पर देखा जाए तो कुल मिली सीट बनाम जीती गई सीटों की संख्या मे ओमप्रकाश राजभर ही आगे है। अब ऐसे में ओमप्रकाश राजभर की ख्वाहिश थी कि उनके बेटे को राज्यसभा भेज दिया जाए। शायद इस पर बात ना बनी हो इसीलिए ओमप्रकाश राजभर अखिलेश यादव को लेकर तमाम बयान दे दिए पहले आजम खान से मिलने जाने की जिद किए उसी समय बयान दे भी दे दिए कि हम गठबंधन के गुलाम नहीं है।बाद मे मीडिया से मुखातिब हुए तो यहां तक कह दिया कि अखिलेश को AC कमरे से बाहर निकल कर सड़क पर संघर्ष करना चाहिए। चुनाव हारने के बाद स्वामी प्रसाद मौर्या भी यही चाह रखते थे कि काश उन्हें भी राज्यसभा की गद्दी मिल जाए लेकिन ओमप्रकाश राजभर के साथ-साथ स्वामी प्रसाद मौर्या के सपनों पर भी पानी फिर गया।

 

UP के लिहाज से राज्यसभा चुनाव का गुड़ा गणित

 

उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की एक सीट के लिए से 35 विधायकों की आवश्यकता है।संख्या बल के हिसाब से यह तो तय है कि बीजेपी कोटे से 7और समाजवादी पार्टी कोटे से 3 व्यक्ति राज्यसभा जा सकते हैं। लड़ाई कुल मिलाकर 11वीं सीट के लिए होगी। विधानसभा में भाजपा गठबंधन के पास 273 तो वहीं सपा गठबंधन के पास कुल 125 विधायक है। राजा भैया की पार्टी जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के पास 2 कांग्रेस पार्टी के पास 2 और बसपा के पास 1 विधायक है। विधानसभा चुनाव के दौरान ही राजा भैया और अखिलेश यादव के बीच तल्खी देखने को मिली थी जिसके बाद यह साफ हो गया था कि राजा भैया अखिलेश यादव का साथ नहीं देगे।11वीं सीट के लिए राजा भैया अपने 2 सीटों का समर्थन भारतीय जनता पार्टी को दे सकते हैं। वहीं कांग्रेस पार्टी अपने एक विधायक का समर्थन सपा को दे सकते हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बहुजन समाजवादी पार्टी किसी को समर्थन नहीं देगी ।

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