उत्तर प्रदेश का सुप्रसिद्ध धार्मिक और पौराणिक जिला वाराणसी इस समय सुर्खियों में है। दरअसल सोमवार को बनारस में स्थित ज्ञानवापी परिसर में शिवलिंग मिलने से हड़कंप मच गया, हिंदू पक्षों का दावा है कि जहां वजू किया जाता था वहां पर एक भव्य 12 फीट की शिवलिंग मिली है। शिवलिंग मिलते ही बनारस जिला अदालत ने उस स्थान (वजूखाना जहां शिवलिंग मिली है) को तुरंत सील करने का आदेश दे दिया और वहां किसी भी व्यक्ति के प्रवेश को वर्जित कर दिया गया।

 

शिवलिंग मिला है तो हमें संतुलन बनाना होगा :SC

मुस्लिम पक्ष के लोगों ने वाराणसी जिला अदालत के इस फैसले को अस्वीकार किया और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस चंद्रचूड़ ने निर्देश दिया कि अगर शिवलिंग मिला है तो हमें संतुलन बनाना होगा हम डीएम को निर्देशित करेंगे कि उस स्थान की सुरक्षा करें लेकिन मुस्लिम को नमाज करने से ना रोका जाए। साथ ही कार्यवाही के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने वाराणसी के जिलाधिकारी को उस परिसर को सील करने का निर्देश दिया जहां शिवलिंग पाया गया है। वजू खाना में प्रवेश प्रतिबंधित है और इसका उपयोग नहीं किया जाएगा। केवल 20 लोगों को प्रार्थना के लिए अनुमति दी जाएगी।

 

क्या होता है वजू खाना, जहां मिला है शिवलिंग?

वजू खाना उस स्थान को कहते हैं जहां नमाज पढ़ने से पहले नमाजी अपने हाथ पैर को धोते हैं और कुल्ला करते है। ज्ञानवापी परिसर में यह वजू खाना उसी स्थान पर मौजूद है जहां सर्वे के दौरान शिवलिंग होने का दावा हिंदू पक्ष के द्वारा किया जा रहा है। ज्ञानवापी परिसर में वजू खाने के पास एक कुआं है और कुआं पानी से भरा था उसमें कुछ मछलियां भी थी। कुएं से पानी निकालने के बाद वहां शिवलिंग दिखी है। जिसके बाद पूरे ज्ञानवापी परिसर के आसपास हर हर महादेव के नारे लगने लगे और पूरा बनारस भोले के भक्ति में डूब गया। सोशल मीडिया पर कुछ लोग इसे मुसलमानों का हिंदू देवी-देवताओं के प्रति घृणा बता रहे हैं। वजू खाने के इस स्थान पर शुरुआत में मुस्लिम पक्ष सर्वे कराने के लिए तैयार नहीं था मुस्लिमों का कहना था कि यहां पानी निकालने से मछलियां मर जाएंगी लेकिन बाद में वहां मौजूद तालाब से पानी निकालकर उसका सर्वे कराया गया।

 

सर्वे में मिला शिवलिंग आदि विश्वेश्वर महादेव की है?

 

हिंदू पक्ष का दावा है कि ज्ञानवापी परिसर में मिला शिवलिंग आदि विश्वेश्वर महादेव का है। हिंदू पक्ष के लोग इसी इसी तरह से अपने आधार को मजबूती से रख रहे हैं उनका मानना है कि जहां आज ज्ञानवापी मस्जिद है वह बरसों पहले भगवान विशेश्वर का भव्य मंदिर था। उनका यह भी दावा है कि वजू खाने के नीचे एक दीवार है, जिसे तोड़ कर प्राचीन मंदिर से जुड़े अन्य साक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं। हिंदू पक्षकारों का मानना है कि इस दीवार के नीचे एक तहखाना हो सकता है, जिसमें शिलालेख और हिन्दू देवी देवताओं की अन्य मूर्तियां हो सकती हैं। अब हिंदू पक्षों के लोग इस सर्वे के लिए भी अदालत में याचिका लगाने की बात कही है।

 

शिवलिंग मिलने के बाद चारो तरफ 1991कानून कि चर्चा-

हिंदू पक्षकारों के द्वारा जैसे ही दावा किया गया कि ज्ञानवापी परिसर के अंदर भगवान भोले की एक भव्य 12 फीट के शिवलिंग मिली है। तुरंत अदालत ने उस स्थान को सील कर दिया और वहां किसी को भी जाने की इजाजत से वर्जित कर दिया गया। अभी अदालत ने अपना फैसला नहीं सुनाया है लेकिन AIMIM के चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने अभी से इसका विरोध कर रहे है उन्होंने ट्वीट करते हुए कहा कि अगर इतिहास की बात करना है तो बात निकली है तो दूर तलक जाएगी।बेरोजगारी, महंगाई, वगैरह के जिम्मेदार औरंगजेब ही हैं। प्रधानमंत्री मोदी नहीं, औरंगजेब ही हैं।अगले ट्वीट में ओवैसी ने शिवलिंग होने के दावा पर सवाल खड़े किए। ओवैसी ने एक वीडियो जारी कर पूछा कि मस्जिद कमेटी ने बताया है कि वो शिवलिंग नहीं, फव्वारा था। अगर शिवलिंग मिला था तो कोर्ट के कमिश्नर को ये बात बतानी चाहिए थी।ओवैसी ने सोमवार को कहा कि वह ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वेक्षण से आहत हैं और 1991 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अनदेखी की गई है।

 

क्या कहता है 1991 का उपासना स्थल कानून?

हिंदू पक्षकारों द्वारा जैसे ही शिवलिंग मिलने का दावा किया गया 1991 का प्लेसेस आफ वरशिप एक्ट( उपासना स्थल कानून)की चर्चा चारों ओर हो रही है। अब चर्चा इस बात की हो रही है कि क्या ज्ञानवापी परिसर में मिले शिवलिंग पर यह कानून लागू होगा या नहीं? दरअसल साल 1991 में नरसिम्हा राव सरकार इस कानून को लेकर आई थी। इस कानून के तहत देश में धार्मिक स्थलों पर 15 अगस्त 1947 के दिन की यथास्थिति लागू है, आसान भाषा में कहें तो 15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता। अयोध्या मामले को इसका अपवाद माना गया है। राम मंदिर आंदोलन के बाद देशभर में मौजूद मस्जिद और मंदिर की लड़ाई तेज हो गई थी। मंदिर मस्जिद को लेकर अलग-अलग दावे होने लगे थे। किसी मंदिर मस्जिद विवाद को खत्म करने के लिए नरसिम्हा राव सरकार यह कानून लेकर आए थी । उस वक्त बीजेपी ने इस कानून का खूब विरोध किया था। अश्वनी उपाध्याय ने इस कानून को लेकर कोर्ट में एक याचिका भी लगाई है उनका मानना है कि यह कानून हिंदू, जैन, सिख और बौद्ध धर्म के लोगों को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित करता है। जिन धार्मिक और तीर्थ स्थलों को विदेशी आक्रमणकारियों ने तोड़ा, उसे वापस पाने के उनके कानूनी रास्ते को भी बंद करता है ।

 

ज्ञानवापी परिसर पर यह कानून लागू होगा कि नहीं?

यह कानून और ज्ञानवापी मामले को लेकर लोगों की राय अलग-अलग हैं। कुछ संविधान जानकारों का मानना है कि अगर शिवलिंग और अन्य साक्ष्य जिनके मिलने का दावा हिंदू पक्षकारों द्वारा किया जा रहा है। वह कोर्ट में साबित हो जाता है कि ज्ञानवापी मस्जिद के स्थान पर मंदिर थी, तो 1991 का उपासना स्थल कानून कोई बाधा नहीं बनेगा। क्योंकि यह बात साफ हो जाएगा कि 15 अगस्त 1947 को मस्जिद वाले स्थान पर अगर शिवलिंग मौजूद है तो इसे मस्जिद की मान्यता नहीं मिलेगी। सार्वजनिक जगह नमाज पढ़ने से कोई भी स्थान धार्मिक स्थान में तब्दील नहीं होता है। नमाज पढ़ने के आधार पर मुस्लिम पक्ष अगर मस्जिद होने का दावा करते हैं तो यह ज्यादा देर तक कोर्ट में नहीं ठहर सकता।आज भी पब्लिक डोमेन में औरंगजेब द्वारा काशी विश्वनाथ मंदिर तोड़े जाने का दस्तावेज और साक्ष्य मौजूद है। आजादी से पहले 1936 में भी मोहम्मद नाम के एक व्यक्ति द्वारा वाराणसी जिला अदालत में यह याचिका दायर की गई थी कि ज्ञानवापी परिसर को मस्जिद की जमीन घोषित कर दी जाए, जिसके बाद 1937 में अदालत ने मोहम्मद के इस याचिका को खारिज कर दिया। लेकिन इस स्थान पर नमाज पढ़ने की इजाजत दे दी गई।

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