जब साल 2020 में जदयू और भाजपा ने साथ मिलकर सरकार बनाई थी । तभी से यह अनुमान लगने शुरू हो गए थे कि यह सरकार ज्यादा दिन तक नहीं चल पाएगी । एक बार नीतीश कुमार ने अपना तेवर दिखाते हुए बीजेपी से अपना पुराना रिश्ता तोड़ लिया है । इसमें कोई शक नहीं है कि नीतीश कुमार राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी है । तब ही तो 7 बार बिहार के सीएम की कुर्सी संभालने के बाद अब 8वीं बार के लिए तैयार है ।

 

मंगलवार को अपने विधायकों की मीटिंग में भाजपा से अलग होने की आधिकारिक घोषणा करने के बाद सीएम पद से इस्तीफा दे दिया है । बता दें कि नीतीश कई मुद्दों पर बीजेपी से लगातार नाराज चल रहे थे, जिसके बाद नौबत यहां तक आ पहुंच गई कि उन्होंने अपना रास्ता बदल लिया है । अब एक बार फिर से बिहार में महागठबंधन की सरकार बनने जा रही है । ऐसे में जानिए इंजीनियर नीतीश कुमार से सीएम नीतीश कुमार बनने का अब तक का उनका राजनीतिक सफर और उनका बीजेपी से नाता तोड़ने की बड़ी वज़ह ।

नीतीश कुमार ने तोड़ा बीजेपी से रिश्ता

इंजीनियरिंग रास नहीं आई तो चुना राजनीति

1 मार्च साल 1951 को बिहार के बख्तियारपुर में जन्मे नीतीश कुमार के पिता कविराज राम लखन सिंह एक आयुर्वेदिक डॉक्टर होने के साथ-साथ एक स्वतंत्रता सेनानी भी थे । नीतीश कुमार की मां परमेश्वरी देवी गृहणी थी । उन्होंने एनआईटी पटना से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री ली और फिर बिहार राज्य विद्युत बोर्ड में नौकरी की । हालांकि नौकरी में उनका मन नहीं लगा तो उन्होंने राजनीति को चुना ।

 

दो बार हार का मुंह देखने के बाद बनें थे विधायक 

नीतीश कुमार जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, कर्पूरी ठाकुर और जॉर्ज फर्नाडीज से काफी प्रभावित थे । साल 1974 में वो जेपी आंदोलन से जुड़े थे । अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत उन्होंने साल 1977 में की थी, हालांकि दो बार हार मुंह देखने के बाद साल 1985 में पहली बार हरनौत से विधायक बनकर विधानसभा पहुंचे ।

 

पहली बार साल 2000 में मुख्यमंत्री बने थे नीतीश

एनडीए में रहते हुए नीतीश कुमार को बिहार में एनडीए का नेता चुना गया था , जिसके बाद वो पहली बार साल 2000 में मुख्यमंत्री बने । हालांकि उनका कार्यकाल कुछ दिनों का था । 151 विधायकों के साथ एनडीए तत्कालीन 324 सदस्यीय सदन में बहुमत साबित करने में असमर्थ था । संख्या साबित करने से पहले नीतीश कुमार को इस्तीफा देना पड़ा था । इसके बाद साल 2005 में नीतीश कुमार एक बार फिर से मुख्यमंत्री बने और उनका यह कार्यकाल नवंबर 2005 से नवंबर 2010 तक चला ।

इंजीनियरिंग रह चुके हैं नीतीश कुमार

 

वर्ष 2015 में नीतीश कुमार फिर से बिहार के मुख्यमंत्री बने

इसके बाद साल 2010 में भी उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली थी , लेकिन इस दौरान साल 2014 में लोकसभा चुनाव से पहले उनकी बीजेपी के साथ चल रही गाड़ी पटरी से उतर गई । जून 2013 में यह साफ हो जाने के बाद कि एनडीए के नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे, उन्होंने भाजपा से अपना पुराना नाता तोड़ लिया । फिर लोकसभा चुनाव साल 2014 में मिली करारी हार की जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया और जीतनराम मांझी को बिहार की कमान सौंप दी । एक साल बाद यानी 2015 में नीतीश कुमार फिर से बिहार के मुख्यमंत्री बने ।

 

साल 2017 में महागठबंधन से किया था किनारा

फरवरी साल 2015 में नीतीश कुमार की पार्टी जदयू ने लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में राजद के साथ गठबंधन किया और चुनाव लड़ा था । राजद, कांग्रेस और वाम दलों के समर्थन से नीतीश कुमार महागठबंधन के मुख्यमंत्री बने । 20 महीने तक सरकार चलाने के बाद जुलाई 2017 में उन्होंने महागठबंधन से किनारा कर लिया था और बीजेपी के साथ मिलाकर बिहार के नीतीश कुमार फिर से सीएम बने ।

नीतीश कुमार ने महागठबंधन तोड़ा

बीजेपी से रिश्ता तोड़कर नीतीश कुमार ने महागठबंधन के हाथ मिलाया

फिर साल 2020 में बीजेपी के साथ चुनाव लड़ा और फिर से सीएम पद की शपथ ली । इस चुनाव में जदयू को सिर्फ 43 सीटें मिलीं, जबकि भाजपा ने 74 सीटें जीती थी । ज्यादा सीटें हासिल करने के बाद भी बीजेपी ने नीतीश कुमार को सीएम बनाया, लेकिन कई मुद्दों पर बीजेपी से नाराज होने के बाद अब (अगस्त 2022 ) एक बार फिर बीजेपी से रिश्ता तोड़कर नीतीश कुमार ने महागठबंधन के हाथ मिला लिया और फिर से बिहार की कमान अपने हाथों में लेने जा रहे है ।

नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी

नीतीश ने छोड़ बीजेपी का दामन सामने आई ये वज़ह-

 

  • बीजेपी के खिलाफ नहीं बोल‌ पाते थे नीतीश

कई बार नीतीश कुमार केंद्र सरकार के फैसलों के खिलाफ खड़े होना चाहते थे जैसे कि कृषि बिल, जाति आधारित जनगणना, बिहार को विशेष राज्य देने की मांग हो या अग्निवीर का मसला । लेकिन भाजपा के साथ की मजबूरी ने उन्हें रोक दिया । वह चाहते हुए भी इसके खिलाफ कुछ नहीं बोल पाते थे ।

 

  • चिराग का लगातार नीतीश कुमार के खिलाफ बयान

चिराग खुले मंच से हमेशा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की तारीफें किया करते थे, लेकिन जब उनकी ही पार्टी में फूट पड़ी तो भाजपा ने उनका साथ नहीं दिया । यहां तक की चिराग का फोन भी भाजपा हाईकमान ने नहीं उठाया था । रामविलास पासवान के भाई पशुपति कुमार पारस ने सांसदों का सपोर्ट दिखाते हुए भाजपा के साथ हाथ मिला लिया और खुद केंद्रीय मंत्री बन गए । चूंकि चिराग खुद लगातार नीतीश कुमार के खिलाफ बयान दे रहे थे, इसलिए तब नीतीश ने कुछ नहीं बोला । लेकिन नीतीश कुमार ने इसे खुद के लिए एक अल्टीमेटम समझा था ।

 

  • जिन नेताओं के रिश्ते भाजपा से हुए मजबूत उनको निकाल

पिछले एक साल के अंदर नीतीश कुमार को कई बार लगा कि भाजपा अब उनकी ही पार्टी में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है । मतलब जदयू के विधायकों, सांसदों और नेताओं को तोड़कर भाजपा अकेले दम पर सरकार बना सकती है । ऐसे में उन्होंने अपनी पार्टी की निगरानी शुरू कर दी । यह देखने लगे कि उनकी पार्टी के किस-किस नेताओं के रिश्ते भाजपा से मजबूत हो रहे है । ऐसे लोगों को नीतीश चुन-चुनकर निकालने लगे ।

 

  • इन सभी नेताओं को नीतीश कुमार ने पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया

सबसे पहले निशाने पर आए जदयू के प्रवक्ता अजय आलोक, पार्टी के प्रदेश महासचिव अनिल कुमार, विपिन कुमार यादव, भंग समाज सुधार सेनानी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष जितेंद्र नीरज । अजय आलोक टीवी चैनलों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा की जमकर तारीफें किया करते थे । ऐसे में इन सभी को नीतीश कुमार ने पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया ।

बता दें कि मिली जानकारी के मुताबिक 11 अगस्त तक बिहार में नई सरकार बन सकती है । जदयू, राजद, कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल एकसाथ आ सकते है । फिर से बिहार में महागठबंधन तैयार हो सकता है ।

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