कांग्रेस पार्टी इस समय अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। एक के बाद एक कई चुनाव में कांग्रेस पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ रहा है फिर चाहे वह चुनाव लोकसभा का हो या विधानसभा का । हाल के दौर में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड,पंजाब,गोवा और मणिपुर पांच राज्यों में चुनाव हुए जिसमें कांग्रेस पार्टी को इतनी बुरी हार मिली कि उत्तरप्रदेश मे 97%प्रत्याशियों ने अपना जमानत तक नहीं बचा पाए। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी कुल 399 सीटों पर अपने उम्मीदवारों को उतारा था जिनमें से 387 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई ।

2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव मे भी कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन कुछ खास नहीं था । यही कारण है कि कांग्रेस पार्टी अब अपने हार की समीक्षा, आगामी चुनाव की रणनीति, और संगठन में आमूलचूल परिवर्तन के लिए उदयपुर में तीन दिवसीय चिंतन शिविर का आयोजन किया था। इस चिंतन शिविर में 400 से भी अधिक कांग्रेस के बड़े दिग्गज नता मौजूद थे। और कई बड़े अहम महत्वपूर्ण फैसले भी लिए गए।चिंतन शिविर के अंतिम दिन इस बात की सुगबुगाहट महसूस की गई की पार्टी के बड़े नेता पुनः राहुल गांधी को अध्यक्ष के रूप में देखना चाहते हैं। आपको बता दें कि कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद के लिए अगस्त में चुनाव होने वाले है । राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस चिंतन शिविर में भी कांग्रेस पार्टी वही गलती करने जा रही है जो गलती वह 1998 के चिंतन शिविर में की थी।

 

गांधी परिवार कांग्रेस की ‘मजबूरी’ या ‘कमजोरी’-

 

भारतीय जनता पार्टी और खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी परिवारवाद को लेकर हमेशा कांग्रेस पार्टी पर हमलावर रहते हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में “घोर परिवार वादी” जैसे शब्दों का खूब इस्तेमाल किया था। नतीजतन बीजेपी को इसका फायदा भी मिला एक बार फिर उत्तर प्रदेश में बीजेपी की पूर्ण बहुमत से सरकार बन गयी। लेकिन आज भी कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी को ही अपना अध्यक्ष बनाने के मूड में है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव के साथ-साथ दिल्ली बिहार,पश्चिम बंगाल,राजस्थान, छत्तीसगढ़,मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश,पंजाब,मणिपुर,गोवा, और उत्तराखंड इन राज्यों में भी राहुल गांधी के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा गया लेकिन जीत सिर्फ 2 राज्यों में मिली राजस्थान और छत्तीसगढ़। कुल मिलाकर कहे तो राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर मे है। कांग्रेस पार्टी अपने बुरे दौर से उबरने के लिए चिंतन शिविर का आयोजन की थी। कांग्रेस पार्टी के बुरे दौर में जाने के पीछे सबसे बड़ा कारण परिवारवाद का आरोप है। और चिंतन शिविर के बाद कांग्रेस पार्टी फिर से राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने जा रही है। अब इसे महज नौटंकी नहीं तो और क्या कहा जाए?

 

कांग्रेस पार्टी को बीजेपी से क्या सीखना चाहिए?

 

1980 में बनी भारतीय जनता पार्टी 84 के चुनाव में महज 2 सीटों पर सिमट गई थी। 84 के चुनाव में कांग्रेस को बंपर जीत मिली थी। उसके बाद से ही बीजेपी के सीटों की संख्या बढ़ती गई और कांग्रेस की सीटों की संख्या दिन प्रतिदिन कम होती चली गई। कांग्रेस पार्टी के स्थापना 1885 में हुई थी 1885 से लेकर 1998 तक 113 वर्षों में कांग्रेस पार्टी के कुल 63 व्यक्ति अध्यक्ष पद पर रह चुका है। औसतन एक व्यक्ति 2 वर्षों से भी कम समय तक अध्यक्ष पद पर रहा, वही 98 से लेकर अब तक 24 वर्षों में सिर्फ दो ही अध्यक्ष सोनिया गांधी और दूसरे राहुल गांधी.यह समय अवधि कांग्रेस पार्टी के लिए उसके इतिहास का सबसे बुरा काल है। राहुल गांधी को भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेता अटल बिहारी बाजपेई से कुछ सीख लेना चाहिए 1998-99 का लोकसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व पर लड़ी और जीती भी और अटल बिहारी वाजपेई प्रधानमंत्री बने। 2004 का भी चुनाव अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में ही लड़ा जाता है लेकिन अटल बिहारी बाजपेई हार जाते हैं जिसके बाद उन्हें राजनीति के हाशिए पर पहुंचा दिया जाता है। 2009 का लोकसभा चुनाव अटल बिहारी बाजपेई के नहीं बल्कि लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में लड़ा गया आडवाणी भी 2009 के लोकसभा चुनाव में कुछ कमाल नहीं कर पाते हैं। फिर अगला चुनाव 2014 का नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लड़ा जाता है और बीजेपी की बंपर जीत होती है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बनाया जाता है। यही सीख आज कांग्रेस को भाजपा से सीखनी चाहिए कि “अगर राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी को लगातार हार का सामना करना पड़ रहा है तो आगामी लोकसभा या विधानसभा चुनाव उनके नेतृत्व में ना लड़ा जाए” लेकिन ऐसा करने के मूड में फिलहाल कांग्रेस पार्टी नहीं है।

 

चिंतन शिविर का फैसला गांधी परिवार पर होगा लागू?

 

उदयपुर में आयोजित कांग्रेस चिंतन शिविर में कई बड़े फैसले लिए गए हैं, जिसमें से सबसे महत्वपूर्ण फैसला यह है कि एक परिवार एक टिकट मतलब साफ है कि किसी एक परिवार से एक ही व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है। अब अगर ऐसा होता है तो आने वाले लोकसभा चुनाव में क्या सोनिया गांधी चुनाव नहीं लड़ेंगी? या फिर राहुल गांधी चुनाव नहीं लड़ेंगे ? फिर प्रियंका गांधी का भविष्य क्या होगा? उत्तर प्रदेश के रायबरेली लोकसभा सीट से गांधी परिवार से कौन चुनाव लड़ेगा? तमाम सवाल ऐसे हैं जिनका उत्तर वर्तमान समय में नहीं है। यदि सोनिया गांधी या प्रियंका गांधी और राहुल गांधी चुनाव लड़ते हैं तो यहां कांग्रेस पार्टी द्वारा लिए गए फैसले का उल्लंघन है। कांग्रेस पार्टी ने एक और महत्वपूर्ण फैसला लिया है इस फैसले के तहत यह स्पष्ट किया गया है 5 वर्षों तक पार्टी में कार्य करने के बाद ही किसी व्यक्ति को टिकट दिया जाएगा। लेकिन वह व्यक्ति किसी मुख्यमंत्री सांसद विधायक का बेटा या परिवार से होगा कि नहीं यह स्पष्ट नहीं किया गया है। जिससे तमाम सवाल खड़े हो रहे।

 

2024 के लिए कांग्रेस की रणनीति और कमजोरी

 

राजस्थान के उदयपुर में आयोजित चिंतन शिविर मे कांग्रेस पार्टी आगामी चुनाव को लेकर कई संगठनात्मक बदलाव करने जा रही है । माना जा रहा है कि 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस पार्टी अभी से कमर कस ली है। चिंतन शिविर में पार्टी एक परिवार, एक टिकट’ का फार्मूला लागू करने, संगठन में हर स्तर पर युवाओं को 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने और अगले लोकसभा चुनाव से 50 प्रतिशत टिकट 50 साल से कम उम्र के लोगों को देने का भी फैसला किया गया है । 2 अक्टूबर से कांग्रेस पार्टी सामाजिक सद्भावना बढ़ाने के लिए भारत जोड़ो यात्रा निकालने जा रही है। यह कांग्रेस पार्टी के लिए संजीवनी का काम कर सकता था लेकिन अगस्त में होने वाले अध्यक्ष पद के लिए अगर राहुल गांधी को पुनः चुना गया तो इससे यह साफ होता है कि भारत जोड़ो यात्रा राहुल गांधी के ही नेतृत्व में होगा। फिर यह कितना सफल होगा यह देखना दिलचस्प होगा।

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