विवेक रंजन अग्निहोत्री जी आपने द कश्मीर फाइल बना कर दिल चीर डाला,ऐसा लगता है आपने कश्मीर के दर्द को सुना नहीं है बल्कि उसके सीने से दर्द बाहर खींच लिया है जो पिछले 30 साल से दफन था। आपने उस पंक्ति को साकार किया है जिसमे लिखा है कि “काश कोई आईना चेहरे की मुस्कुराहट के पीछे छुपे दर्द को दिखाता,काश कोई फोटोग्राफर तस्वीर में दिखते,हंसते हुए चेहरे का दर्द भी खींच पाता,काश कोई फिल्मकार दिल में दफन जख्मों को बयान कर पाता,आपने इस फिल्म में वो सब दिखाया है जो कोई नही दिखा पाएगा या पहले भी किसी ने दिखाने की हिम्मत की हो।

कश्मीर की उस काली रात के रहस्य व कश्मीरी पंडितों के दर्द को जिस तरीके से विवेक अग्निहोत्री जी ने अपने सहयोगी लेखक सौरभ एम पांडे के साथ मिलकर झंकझोर देने वाला और सच को खींचकर बाहर लाने वाली स्क्रिप्ट व स्क्रीन प्ले दिया है वो काबिले तारीफ है। हर फ्रेम चीख रही है, सीधे दिल से कनेक्ट कर रही है,तभी तो सिनेमा घरों से लोग रोते हुए निकल रहे हैं। विवेक जी की कहानी कृष्णा पंडित को केंद्र में रखकर कश्मीर जाती है और ब्रह्म दत्त, विष्णु राम, डीजीपी हरि नरेन, डॉक्टर, राधिका मेनन आदि महत्वपूर्ण किरदारों को उठाती है। इत्मीनान से पुष्कर पंडित को सुनती है। इतने सालों से दफन तर्क व असल सच को पटक कर रख देती है। पुष्कर पंडित की सच्चाई का अंत इतना भयावह है कि कमज़ोर दिल वाले दर्शक आँखें बंद कर लेंगे। देखा न जाएगा। वो अंत में गोलियों की आवाज वाकई झकझोर कर रख दे रही है।इस फिल्म का सबसे बेहतरीन डायलॉग ‘कश्मीर को जन्नत कहते है और वे लोग कश्मीर को जहन्नुम बनाकर जन्नत के लिए जिहाद करते है’ कहानी ऐसे ऐसे सीक्वेंस सामने आती है। उन्हें देखकर रूह कांप उठती है। पति के खून से सने गेंहू खिलाना हो। इसे देखकर तो बीजीएम भी थम जाता है। उससे भी न देखा गया। एयरफोर्स के अधिकारियों को सरेआम गोली मार देना हो। मतलब ऐसा लग रहा है जैसे विवेक जी ने उस जिंदगी को जिया है।

 

फिल्म में अनुपम खेर ने 370 मुद्दे को लेकर डाली जान

 

फिल्म में अनुपम खेर ने जो एक्टिंग में जान झोंकी है वो अब तक की बेस्ट परफॉर्मेंस बोला जा रहा है,जिस तरह से इस फिल्म में 370 का जिक्र किया गया वो भी देखने योग्य है क्योंकि 370 को लेकर कश्मीरी पंडित बहुत परेशान रहे है और वो हमेसा से चाहते थे की इस आर्टिकल को हटाया जा सके ताकि फिर से एक बार पंडितो को वहा सरकार बसा सके,अभी तक हमारे देश को मीडिया ये कंप्लीट दिखाती आई है की कैसे भोपाल गैस काण्ड हुआ,कैसे दिल्ली का दंगा हुआ,कैसे इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाई लेकिन मीडिया को कभी ये महत्वपूर्ण लगा ही नहीं की कैसे कश्मीरी पंडितो को उनके ही घर से निकाल कर रिफ्यूजी बना दिया गया। इतिहास में बहुत अकबर को महान बताया गया,ये भी बताया गया की मुगलों ने कैसे देश में इमारतें बनाई, यहां तक की हिटलर के बारे में बताना भी जरूरी समझा गया लेकिन जब बात कश्मीरी पंडितो पे आई तो मीडिया से लेकर बॉलीवुड के भांडों ने चुप्पी साध ली। विवेक अग्निहोत्री जी अच्छी फिल्म बनाते है ये तो सबको पता था लेकिन वो फिल्म के जरिए वो भाव ला देते है को इंसान जिया रहता है ये इस फिल्म से पता चला। जिस तरीके से फिल्म में जेहाद दिखाया गया है वो आने वाले समय के लिए अलार्म भी है कई राज्यों के लिए क्योंकि आज बंगाल हो या फिर केरल स्थिति कुछ ऐसी ही बनती जा रही है,हम बिल्कुल नही चाहते की दुबारा कोई ऐसी सच्ची घटना हो जिसपे फिल्म बनाने के लिए हिम्मत जुटानी पड़ी क्योंकि बॉलीवुड में विवेक अग्निहोत्रि एक है और एक ही रहेंगे।

ये फिल्म कश्मीर में क्या हुआ था ये जानने के लिए तो है ही,बल्कि फिल्म यह सबक सीखने के लिए भी देखो की जनसंख्या नियंत्रण कानून और समानता का अधिकार जिसकी बात करना ही आज बेईमानी है तो भविष्य में लिपस्टिक विदाऊट बुर्का पहने होली के रंग कैसे लगा पाओगे । वैसे भी कश्मीर फ़ाइल के दृश्य 1947 विभाजन की विभीषिका के भयंकर क़त्ल .बलात्कार.धर्म परिवर्तन और पलायन की सच्चाई की पुर्नावृती ही तो थे । किस्से जो बुजुर्गों से सुने उसी सीने में दफन खौफ को पर्दे पर देखा है । जिस किसी को भी काफिर होने का मतलब नही पता यह उनको बताने के लिए है कि उनके लिए हम सिर्फ काफिर हैं काफिर। सुनने में ये भी आया था कि पिछले दिनों कपिल शर्मा शो में द कश्मीर फाइल के स्टार्स को नही बुलाया गया था तो मैं साफ कर दू की ये फिल्म किसी प्रमोशन की मोहताज नही है। पब्लिसिटी स्टंटो और हथकंडों के साथ नैरेटिव एजेन्डा तय करने वाली बालीवुड पर तो अब ऐलान होना बाकी है की फिल्मी नैरेटिव अब दर्शक तय करेगा जो इस फिल्म से दर्शक कर रहा है। फिल्म समीक्षक नहीं हूँ की रेटिंग दूँ पर जो इस फिल्म में दिखाया गया वह किसी की समीक्षा का मोहताज नहीं है।

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