“योगी आदित्यनाथ” आज भारत और उत्तर प्रदेश की राजनीति के एक लोकप्रिय नेतृत्व बनकर उभरे है। उनको विपक्ष ने बुलडोजर बाबा बोल कर खूब चिढ़ाने की कोशिश की लेकिन उन्होने उसी नाम को स्लोगन बना लिया और लोग उनके रैलियों में बुलडोजर लेकर भी पहुंचने लगे। योगी बाबा मोदीजी की तरह ही हिंदुत्व का प्रभावशाली चेहरा है। परंतु योगी जी एक सांसद से भारत के सबसे बड़े सूबे का मुखिया बनने की ये यात्रा इतनी आसन नहीं थी। मोदीजी और योगी जी हिंदुत्व की राजनीति के दो ऐसे नाम है जिन्हे कांग्रेस और सपा ने अपने कुशासन में मिटाने की पुरजोर कोशिश की थी।गोधरा काण्ड में मोदीजी को फसाने के लिए कांग्रेस सरकार ने क्या कुछ नहीं किया था देश की जनता को सब पता है और सुप्रीम कोर्ट ने भी अपना फैसला मोदी के पक्ष में रखा। योगी जी जिन्हे आज पूरा देश हिंदुत्व के प्रभावशाली नेता के रूप में जानता है।कभी समाजवादियों ने इन्हे इस हद तक प्रताड़ित किया था की संसद में योगी की आंखों से आंसू छलक पड़े थे, सदन में अपने साथ हो रही समाजवादी प्रताड़ना को बताते हुए योगी जी फूट-फूट कर रोये थे। योगी आदित्यनाथ की इस जीत को पिछले जीत से बड़ी मानी जा सकती है,कुछ लोगो का कहना है की भाजपा की सीटे कम हो गई है,भाजपा ने 300 पार नही किये,इस से बीजेपी को नुकसान हुआ है। यह जीत पिछली जीत से भी बड़ी है,ये थ्योरी सरासर बेकार है। पहली बात तो यूपी में सरकार का पुनः पूर्ण बहुमत से आना ही बड़ी बात है दूसरा इतने प्रचंड बहुमत के साथ आना। यह जीत तब आई है जब कोरोना की इतनी लंबी महामारी के बाद यूपी सरकार पर पूरी एक लॉबी टूट पड़ी थी। वो सरकार के अच्छे कार्यों को भी मानने को तैयार नही थे। सपा का प्रदर्शन अपने सर्वोच्च शिखर पर रहा है।इसके बाद भी बीजेपी की प्रचंड विजय, वो भी 2017 के वोट से ज्यादा पाते हुए प्राप्त करना अपने आप मे अद्भुत है। कहा जाता है की को मुख्यमंत्री नोएडा जाता है वो दुबारा मुख्यमंत्री नही बनता,इस मिथक को भी योगी के तोड़ा।और इस विजय में यह मिथक भी टूट गया है कि हिंदुत्व का मुद्दा कुछ जातियों की ही है। हिन्दू समाज की के सभी वर्ग के भाई बहनों ने बीजेपी को जमकर वोट दिया है।

 

आवास और राशन आया बीजेपी के काम

 

गांव में टूटे फूटे घर में रहने वाले गरीब लोगो ने बीजेपी को जमकर वोट दिया है क्योंकि मोदीजी व योगीजी की जनकल्याण की योजनाओं ने उनका जीवन बदला है,गरीबों को कोरोना जैसे महामारी में बैठा के खिलाना बहुत बड़ी बात थी। गरीब लोगो को गैस, अनाज, घर, डायरेक्ट बेनिफिट मिला है जिससे उनके अंदर आत्मसम्मान आया है तो साथ ही उन्होंने हिंदू होने के गौरव को भी महसूस किया है।इसी लिए खुलकर वोट दिया है।

 

मायावती का वोट सपा गठबंधन को हुआ ट्रांसफर

 

बीजेपी फिर 2017 को रिपीट कर सकती थी यदि बसपा पिछले चुनाव जितना भी मजबूत रहती, तो भाजपा निश्चित ही 325 पार कर जाती। भाजपा का वोट शेयर घटा नहीं है बल्कि फिलहाल 2% बढ़ा है। असल मामला बसपा और सपा के बीच वोट ट्रांसफर का है। बसपा के वोट लगभग 10% घटे हैं और उतने ही प्रतिशत वोट सपा के बढ़े हैं। पिछला चुनाव समाजवादी पार्टी का वोट शेयर 22% के आसपास था, इस बार 32%। जबकि बहुजन समाज पार्टी 22% से घटकर 12% पर आ गई है। मतलब साफ है कि योगी जी ने 2017 में भाजपा से जो प्राप्त किया था, उसमें से कुछ भी नुकसान नहीं लगाया। 2% ऐड ही किया है। उत्तर प्रदेश की इतनी मुश्किल राजनीति में जहां की दुबारा वापसी ही सबसे बड़ी बात है तिसपर भी वोटरों की संख्या में वृद्धि के साथ, अपने आप में वाकई ऐतिहासिक है। योगी जी ने सीटें कम पाई अवश्य है, लेकिन अपने वोटरों की संख्या में वृद्धि की है। वही प्रियंका गांधी ने लड़की हु लड़ सकती हूं का नारा बुलंद करके खूब लड़ने की कोशिश की लेकिन पूरी तरह से फ्लॉप रही। इस बार तो चुनाव प्रचार से राहुल गांधी को भी दूर रखा गया था लेकिन कुछ काम नही आया। लोगो ने प्रियंका गांधी को भी पूरी तरह से ठुकरा दिया। अब प्रियंका गांधी 2024 के लोकसभा के चुनाव को ध्यान में रख कर यूपी मे आगे बढ़ने का प्रयास कर रही है। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को उत्तर प्रदेश से सीधा और स्पष्ट संदेश मिला कि सीटें कम होना राजनीति का मसौदा अवश्य हो सकता है, लेकिन योगी जी की कर्मठता पर एक तिनका भी संदेह नहीं किया जा सकता। बात ये भी चली थी की योगी जी अयोध्या से लड़ेंगे लेकिन ऐसा नहीं हो पाया और योगी जी को गोरखपुर का सीट दिया गया और गोरखपुर को जनता ने योगी जी को उतना ही प्यार दिया। अब आप अंदाजा लगा सकते है की अखिलेश यादव को अपनी सीट के लिए मुलायम से लेकर शिवपाल तक को प्रचार के लिए उतारना पड़ा वही दूसरी तरफ परचादखिल करने के बाद गोरखपुर में एक दिन बस रोड शो किया था। मतलब कही न कही अखिलेश यादव को डर था की वो अपनी ही सीट न गवा दे।

 

ईवीएम का रोना शुरू

 

चुनाव के ठीक पहले जब बीजेपी के कुछ बड़े नेता जैसे स्वामी प्रसाद मौर्या हुए,जब इन्होंने पार्टी छोड़ कर सपा का रुख किया था तब लोगो को लगा था की शायद बीजेपी का दाव उल्टा पड़ने लगा है लेकिन वैसे बिल्कुल नही हुआ जैसा की खबरे चलने लगी थी,बीजेपी ने अपनी पूरी टीम उतार दी।अब समस्या ये है की करारी हार के बाद फिर से ईवीएम वाला रोना विपक्षी पार्टियों ने शुरू कर दिया है। अभी एक दिन पहले स्वामी प्रसाद मौर्या ने ईवीएम पे सवाल खड़ा किया था की आज खुद सपा के मुखिया अखिलेश यादव ने भी ईवीएम को लेकर ट्वीट कर दिया।अब समस्या ये है की जिन राज्यों में बीजेपी हार जाती है उन राज्यों के ईवीएम को सही बताया जाता है लेकिन जिन राज्यों में बीजेपी जीत जाती है उन राज्यों के ईवीएम को गलत बता दिया जाता है। इसके पहले जब बंगाल में चुनाव हुआ था और बीजेपी हार गई थी तब किसी ने ईवीएम को दोषी नही ठराया था लेकिन अब ईवीएम को दोष देना शुरू हो चुका है।

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